Lok Jagriti Ngo Estd. 2010
( A Ngo Society )

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    फूड सेफ्टी राम भरोसे

    मैगी नूडल्स का विवाद अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि बाजारों में बिकते ब्रेड की क्वॉलिटी पर सवाल खड़े हो गए हैं। सेंटर फॉर साइंट एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की एक हालिया स्टडी से यह राज खुला है कि जिस ब्रेड का इस्तेमाल हम नाश्ते के लिए करते हैं, उसमें कैंसर पैदा करने वाले केमिकल मौजूद हैं। सीएसई ने राजधानी दिल्ली के विभिन्न इलाकों से ब्रेड के नमूने इकट्ठा कर उनकी जांच की और उनमें पोटैशियम ब्रोमेट और पोटैशियम आयोडेट के अंश पाए। दिलचस्प बात यह कि ब्रेड निर्माता कंपनियों ने अपने बचाव में जो दलील दी है, वह यह नहीं है कि उनके उत्पाद पूरी तरह सुरक्षित हैं, या उनमें इन खतरनाक तत्वों के अंश नहीं हैं। यह भी नहीं कि ये केमिकल स्वास्थ्य के लिए खतरनाक नहीं होते। उनकी दलील यह है कि वे तो देश के कानूनों का पालन करते हुए चल रहे हैं। पोटैशियम ब्रोमेट और पोटैशियम आयोडेट के इस्तेमाल पर ज्यादातर देशों में रोक लगी हुई है, लेकिन भारत में ऐसी कोई रोक नहीं है। अब, जबकि सीएसई ने रोक की सिफारिश की है तो शायद कुछ समय बाद सरकार नींद से जागे और इन केमिकल्स पर रोक लगाने की कवायद शुरू हो। लेकिन यह हमारे सरकारी तंत्र की लापरवाही का ही सबूत है कि अपने देश में खाद्य सुरक्षा, प्रदूषण और नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़े तमाम पहलुओं पर ध्यान खींचने वाली लगभग सारी की सारी खबरें सीएसई जैसे एनजीओ या स्वतंत्र संगठनों की पहलकदमी से सामने आती हैं। अमेरिका में फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की विश्वसनीयता का यह आलम है कि किसी भारतीय कंपनी के प्रॉडक्ट को उसकी मंजूरी मिल जाने भर से कंपनी के शेयर रातोंरात चढ़ जाते हैं। इसके बरक्स भारत में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) की मौजूदगी का अहसास तभी होता है जब किसी एनजीओ की रिपोर्ट मीडिया में धमाका कर चुकी होती है। पिछले दिनों मैगी विवाद में एफएसएसएआई की एक लोकल इकाई की प्रो-एक्टिव भूमिका दिखी थी। लेकिन इस विवाद का फायदा उठाकर बाजार में लाए गए स्वदेशी नूडल्स की क्वॉलिटी पर सख्ती बरतने का काम उससे नहीं हो पाया। सरकार को अगर सचमुच नागरिकों के स्वास्थ्य की चिंता है तो उसे अपनी इन एजेंसियों का कामकाज चुस्त-दुरुस्त करना चाहिए।