Lok Jagriti Ngo Estd. 2010
( A Ngo Society )

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    कांग्रेस की चुनौती Source NB T

    कांग्रेस की चुनौती पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद बीजेपी यह प्रचारित करने में जुट गई है कि उसका कांग्रेस मुक्त भारत का अभियान कामयाब हो रहा है और अब जल्दी ही देश से कांग्रेस का सफाया हो जाएगा। मीडिया के एक हिस्से की भी यही राय है। कुछ ऐसा माहौल बना दिया गया है कि राष्ट्रीय पार्टी के रूप में कांग्रेस के दिन अब लद गए हैं। चुनाव नतीजों का अतिरेक में किया गया विश्लेषण हमेशा गलत निष्कर्ष की ओर ले जाता है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने दो राज्य गंवा दिए। असम में पिछले 15 वर्षों से तरुण गोगोई की सरकार थी। अगर इस बार राज्य सरकार के खिलाफ एंटी इन्कम्बेंसी की लहर चली तो यह कोई अजूबा नहीं है। बीजेपी ने अकेले दम पर नहीं, दो स्थानीय पार्टियों के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा था। फिर केरल का इतिहास है कि वहां हर पांच साल पर बारी-बारी से वाम और कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनती रही है। इसलिए केरल में भी कोई नया ट्रेंड नहीं दिखा है। बंगाल और तमिलनाडु में अपने साथियों की दुर्गति के लिए कांग्रेस जिम्मेदार नहीं है। कांग्रेस इससे ज्यादा बुरी स्थितियों से उबरकर आ चुकी है और अपने विरोधियों को चौंकाते हुए उसने अनेक राज्यों और केंद्र की सत्ता संभाली है। असल में बीजेपी ने केंद्र की सत्ता में आने के बाद कांग्रेस के खिलाफ एक मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ रखा है जिसका कांग्रेस उसी की शैली में जवाब नहीं दे पा रही है। पार्टी में उतना बड़ा संकट नहीं है, जितना बड़ा बताया जा रहा है। हां, उसमें आत्मविश्वास की कमी जरूर झलक रही है। असल बात यह है कि पार्टी संक्रमण के दौर से गुजर रही है। पुरानी लीडरशिप धीरे-धीरे किनारे हो रही है, लेकिन नए लोगों के ऊपर पूरी तरह जवाबदेही नहीं सौंपी गई है। वरिष्ठों को लगता है कि शायद समय उनके अनुकूल नहीं रहा। इसलिए वे नए लोगों की तरफ देखने लगे हैं। दूसरी ओर नई पीढ़ी पूरे दमखम के साथ मोर्चा संभालने में यह सोचकर झिझक रही है कि उसके पास अभी अनुभव नहीं। पार्टी इसी उलझन में है। पार्टी को जल्दी ही इससे बाहर निकलना होगा और अपना खोया हुआ आत्मविश्वास हासिल करना होगा। पार्टी को गांधी परिवार से मुक्त करने की बात कहना बहुत आसान है, लेकिन उनके बगैर पार्टी चलाना अभी के हालात में लगभग नामुमकिन है। राहुल गांधी या उनके सहयोगियों को अपने दायरे से बाहर निकलने की जरूरत है। अगर वे लोगों से संवाद बढ़ाएं, जमीनी स्तर पर युवाओं को जोड़ें और उन्हें कुछ हद तक अपने हिसाब से फैसले करने दें, तो पार्टी को नए सिरे से खड़ा करना मुश्किल नहीं है। पार्टी गुजरात और मध्य प्रदेश पर ध्यान केंद्रित करे, जहां बीजेपी के खिलाफ एंटी इन्कम्बेंसी की लहर बन रही है। पंजाब और यूपी में भी उसे क्षमता दिखानी होगी। एकाध मोर्चा हाथ में आते ही लोग उसकी तरफ उम्मीद से देखने लगेंगे।